Happy Republic Day
की गाथाओं से भारतीय इतिहास के पृष्ठ भरे
हुए हैं। देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत हजारों की संख्या में भारत माता के
वीर सपूतों ने, भारत को स्वतंत्रता दिलाने में अपना सर्वस्य न्योछावर कर
दिया था। ऐसे ही महान देशभक्तों के त्याग और बलिदान के परिणाम स्वरूप हमारा
देश, गणतान्त्रिक देश हो सका।
गणतन्त्र (गण+तंत्र)
का अर्थ है, जनता के द्वारा जनता के लिये शासन। इस व्यवस्था को हम सभी
गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। वैसे तो भारत में सभी पर्व बहुत ही
धूमधाम से मनाते हैं, परन्तु गणतंत्र दिवस को राष्ट्रीय पर्व के रूप में
मनाते हैं। इस पर्व का महत्व इसलिये भी बढ जाता है क्योंकि इसे सभी जाति
एवं वर्ग के लोग एक साथ मिलकर मनाते हैं।
गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी को ही क्यों मनाते
हैं? मित्रों, जब अंग्रेज सरकार की मंशा भारत को एक स्वतंत्र उपनिवेश
बनाने की नजर नही आ रही थी, तभी 26 जनवरी 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरु
जी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्णस्वराज्य की शपथ ली। पूर्ण स्वराज
के अभियान को पूरा करने के लिये सभी आंदोलन तेज कर दिये गये थे। सभी
देशभकतों ने अपने-अपने तरीके से आजादी के लिये कमर कस ली थी। एकता में बल
है, की भावना को चरितार्थ करती विचारधारा में अंग्रेजों को पिछे हटना पङा।
अंतोगत्वा 1947 को भारत आजाद हुआ, तभी यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1929
की निर्णनायक तिथी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनायेंगे।
26 जनवरी, 1950 भारतीय इतिहास में इसलिये
भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भारत का संविधान, इसी दिन अस्तित्व मे
आया और भारत वास्तव में एक संप्रभु देश बना। भारत का संविधान लिखित एवं
सबसे बङा संविधान है। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में 2 वर्ष, 11 महिना,
18 दिन लगे थे। भारतीय संविधान के वास्तुकार, भारत रत्न से अलंकृत डॉ.भीमराव अम्बेडकर प्रारूप
समिति के अध्यक्ष थे। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने विश्व के अनेक
संविधानों के अच्छे लक्षणों को अपने संविधान में आत्मसात करने का प्रयास
किया है। इस दिन भारत एक सम्पूर्ण गणतान्त्रिक देश बन गया।देश को गौरवशाली
गणतन्त्र राष्ट्र बनाने में जिन देशभक्तो ने अपना बलिदान दिया उन्हे याद
करके, भावांजली देने का पर्व है, 26 जनवरी।
मित्रो, भारत से व्यपार का इरादा लेकर
अंग्रेज भारत आये थे, लेकिन धीरे -धीरे उन्होने यहाँ के राजाओं और सामंतो
पर अपनी कूटनीति चालों से अधिकार कर लिया। आजादी कि पहली आग मंगल पांडे ने
1857 में कोलकता के पास बैरकपुर में जलाई थी, किन्तु कुछ संचार संसाधनो की
कमी से ये आग ज्वाला न बन सकी परन्तु, इस आग की चिंगारी कभी बुझी न थी। लक्ष्मीबाई से इंदिरागाँधी तक, मंगल पांडे से सुभाष तक, नाना साहेब से सरदार पटेल तक, लाल(लाला लाजपत राय), बाल(बाल गंगाधर तिलक), पाल(विपिन्द्र चन्द्र पाल) हों या गोपाल, गाँधी,
नेहरु सभी के ह्रदय में धधक रही थी। 13 अप्रैल 1919 की (जलिया वाला बाग)
घटना, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे अधिक दुखदाई घटना थी। जब जनरल
डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने गोलियां चला के निहत्थे, शांत बूढ़ों,
महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को मार डाला था और हज़ारों लोगों को
घायल कर दिया था। यही वह घटना थी जिसने भगत सिंह और उधम सिंह जैसे,
क्रांतीकारियों को जन्म दिया। अहिंसा के पुजारी हों या हिंसात्मक विचारक
क्रान्तिकारी, सभी का ह्रदय आजादी की आग से जलने लगा। हर वर्ग भारतमात के
चरणों में बलिदान देने को तत्पर था।
अतः 26 जनवरी को उन सभी देशभक्तों को
श्रद्धा सुमन अपिर्त करते हुए, गणतंत्र दिवस का राष्ट्रीय पर्व भारतवर्ष के
कोने-कोने में बड़े उत्साह तथा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। प्रति
वर्ष इस दिन प्रभात फेरियां निकाली जाती है। भारत की राजधानी दिल्ली समेत
प्रत्येक राज्य तथा विदेषों के भारतीय राजदूतावासों में भी यह त्योहार
उल्लास व गर्व से मनाया जाता है।
26 जनवरी का मुख्य समारोह भारत की राजधानी
दिल्ली में भव्यता के साथ मनाते हैं। देश के विभिन्न भागों से असंख्य
व्यक्ति इस समारोह की शोभा देखने के लिये आते हैं। हमारे सुरक्षा प्रहरी
परेड निकाल कर, अपनी आधुनिक सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करते हैं तथा सुरक्षा
में सक्षम हैं, इस बात का हमें विश्वास दिलाते हैं। परेड विजय चौक से
प्रारम्भ होकर राजपथ एवं दिल्ली के अनेक क्षेत्रों से गुजरती हुयी लाल किले
पर जाकर समाप्त हो जाती है। परेड शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री ‘अमर
जवान ज्योति’ पर शहीदों को श्रंद्धांजलि अर्पित करते हैं। राष्ट्रपति अपने
अंगरक्षकों के साथ 14 घोड़ों की बग्धी में बैठकर लालकिले पर आते हैं, जहाँ
प्रधानमंत्री उनका स्वागत करते हैं। राष्ट्रीय धुन के साथ ध्वजारोहण करते
हैं, उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती है, हवाई जहाजों द्वारा पुष्पवर्षा
की जाती है। आकाश में तिरंगे गुब्बारे और सफेद कबूतर छोड़े जाते हैं। जल,
थल, वायु तीनों सेनाओं की टुकडि़यां, बैंडो की धुनों पर मार्च करती हैं।
पुलिस के जवान, विभिन्न प्रकार के अस्त्र-षस्त्रों, मिसाइलों, टैंको,
वायुयानो आदि का प्रदर्षन करते हुए देश के राष्ट्रपति को सलामी देते हैं।
सैनिकों का सीना तानकर अपनी साफ-सुथरी वेषभूषा में कदम से कदम मिलाकर चलने
का दृष्य बड़ा मनोहारी होता है। यह भव्य दृष्य को देखकर मन में राष्ट्र के
प्रति भक्ति तथा ह्रदय में उत्साह का संचार होता है। स्कूल, कॉलेज की
छात्र-छात्राएं, एन.सी.सी. की वेशभूषा में सुसज्जित कदम से कदम मिलाकर चलते
हुए यह विश्वास उत्पन्न करते हैं कि हमारी दूसरी सुरक्षा पंक्ति अपने
कर्तव्य से भलीभांति परिचित हैं। मिलेट्री तथा स्कूलों के अनेक बैंड सारे
वातावरण को देशभक्ति तथा राष्ट्र-प्रेम की भावना से गुंजायमान करते हैं।
विभिन्न राज्यों की झांकियां वहाँ के सांस्कृतिक जीवन, वेषभूषा,
रीति-रिवाजों, औद्योगिक तथा सामाजिक क्षेत्र में आये परिवर्तनों का चित्र
प्रस्तुत करती हैं। अनेकता में एकता का ये परिदृष्य अति प्रेरणादायी होता
है। गणतन्त्र दिवस की संध्या पर राष्ट्रपति भवन, संसद भवन तथा अन्य सरकारी
कार्यालयों पर रौशनी की जाती है।
26 जनवरी का पर्व देशभक्तों के त्याग, तपस्या और बलिदान की अमर कहानी
समेटे हुए है। प्रत्येक भारतीय को अपने देश की आजादी प्यारी थी। भारत की
भूमि पर पग-पग में उत्सर्ग और शौर्य का इतिहास अंकित है। किसी ने सच ही कहा
है- “कण-कण में सोया शहीद, पत्थर-पत्थर इतिहास है।“ ऐसे ही अनेक देशभक्तों
की शहादत का परिणाम है, हमारा गणतान्त्रिक देश भारत।
26 जनवरी का पावन पर्व आज भी हर दिल में राष्ट्रीय भावना की मशाल को प्रज्वलित कर रहा है। लहराता हुआ तिरंगा रोम-रोम में जोश का संचार कर रहा है, चहुँओर खुशियों की सौगात है। हम सब मिलकर उन सभी अमर बलिदानियों को अपनी भावांजली से नमन करें, वंदन करें।
26 जनवरी का पावन पर्व आज भी हर दिल में राष्ट्रीय भावना की मशाल को प्रज्वलित कर रहा है। लहराता हुआ तिरंगा रोम-रोम में जोश का संचार कर रहा है, चहुँओर खुशियों की सौगात है। हम सब मिलकर उन सभी अमर बलिदानियों को अपनी भावांजली से नमन करें, वंदन करें।
जय हिन्द, जय भारत


2) आलस्य दरिद्रता का मूल है। - यजुर्वेद
3) दुर्भाग्य को नहीं होती आँखें की वह मनुष्य का निरंतर पीछा करे। - डॉ॰ रामप्रसाद कुशवाहा
4) हमे ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता है।
5) मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है, बुद्धि का विकास होता है और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होकर स्वावलंबी बन सकता है। - स्वामी विवेकानंद
6) आत्मोन्न्ति के लिए कठिनाइयों से बढ़कर कोई विद्यालय नहीं है। -मुंशी प्रेमचन्द्र
7) दृढ़ प्रतिज्ञ मनुष्य संसार को अपनी इच्छा के अनुसार झुका लेता है। - गेटे
8) अपने साथ किए गए बुराइयों को बालू पर और अच्छाइयों को पत्थर पर लिखना चाहिए। - सुकरात
9) मूर्ख स्वयं को बुद्धिमान समझते है किन्तु वास्तविक में बुद्धिमान स्वयं को मूर्ख समझते हैं। - सेक्सपियर
10) जिस शिक्षा का असर हमारे चरित्र पर नहीं पड़ता वह किसी काम का नहीं। - महात्मा गाँधी
11) विनम्रता समस्त गुणों की आधारशिला है। - कनफ्यूसियस
12) मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। - नेपोलियन
13) अच्छे विचार रखना भीतरी सुन्दरता है। - स्वामी रामतीर्थ
14) गुणों का समूह हो तो एक दोष वैसे ही छुप जाता है जैसे चंद्रमा की किरणों में उसका कलंक । - कालिदास
15) जहाँ डींग समाप्त होती है प्रतिष्ठा वहीं से शुरू होती है। - शरतचंद्र
16) महान पुरुष अवसर की कमी की शिकायत कभी नहीं करते – इमर्सन
17) जो महान उद्देशय के लिए मरते हैं उनकी कभी हार नहीं होती – बायरन
18) निर्णय अनिर्णय के बीच झूलते व्यक्ति से बड़ा दरिद्र और कोई नहीं – विलियम जेम्स
19) अपनी अज्ञानता का आभास हो जाना ही ज्ञान का प्रथम सोपान है – डिजाराइली
20) असफलता से हमारी बुद्धि का जितना विकास होता है उतना सफलता से नहीं – स्माइल्स
21) दोष निकालना जितना आसान है उन्हे सुधारना उतना कठिन – प्लुटार्क
22) गुरुजनों को प्रणाम और बड़े बूढ़ों की सेवा करने वाले की आयु, विद्या, यश और बल ये चार चीजें बढ़ती है – मनुस्मृति
23) सत्य बोलने वाले को अपने मस्तिष्क पर यह बोझा नहीं ढोना पड़ता कि उसने कब किससे क्या कहा था – महात्मा गाँधी
24) उससे मित्रता कभी न कर जो तुझसे बेहतर नहीं – कन्फ़्यूसिअस
25) कुरूप मनुष्य का सौन्दर्य विद्या है, तपस्वियों का सौन्दर्य क्षमा है – चाणक्य
26) ऐसी बात मत कहो जिस पर खुद भी अमल ना कर सको – कुरान शरीफ
27) मेहनत का अन्त आराम है – अरस्तू
28) चित्त कि वृत्तियों को वश में रखना ही योग है – पतंजलि
29) मूर्खों से अपनी प्रसंशा सुनने के बजाय बुद्धिमानों कि लताड़ सुनना श्रेयकर है – बाइबिल
30) विचार कितने ही अच्छे क्यों न हों तदनुकूल आचरण नहीं है तो वे निरर्थक है – गीता
31) असफलता से निराश मत हो वह तो तुम्हारे लिए एक नई प्रेणना है – साउथ
32) अग्नि स्वर्ण को परखती है और मुसीबत वीर पुरुष को – लेवेटर
33) एकान्त प्राय: सर्वोत्म संगति है – मिल्टन
34) चरित्र की संपत्ति दुनिया के समस्त दौलतों से बढ़कर है – महात्मा गाँधी
35) अपनी भूल को स्वीकार कर लेना एवं वैसी भूल फिर न करने का प्रयास करना वीर एवं शूर होने का प्रतीक है – महात्मा गाँधी
36) अहिंसा वीरों का अस्त्र है और हिंसा कायरों का – महात्मा गाँधी
37) कायरता से हिंसा अच्छी है – महात्मा गाँधी
38) एक क्षण भी बिना काम के रहना एक प्रकार की चोरी है – महात्मा गाँधी
39) यदि मनुष्य सीखना चाहे तो उसकी हर भूल उसे शिक्षा दे सकती है – महात्मा गाँधी
40) कर्म ही जीवन की सफलता ककई कुंजी है – स्वामी विवेकानंद
41) हमारा उद्देश्य संसार के प्रति भलाई करना है, अपने गुणों करना नहीं – स्वामी विवेकानन्द
42) निराशा निर्बलता का चिन्ह है – स्वामी रामतीर्थ
43) लक्ष्य को ही अपना जीवन कार्य समझों, हर समय उसका चिन्तन करो, उसी का स्वप्न डेखो और उसी के सहारे जीवित रहो – स्वामी विवेकानंद


अनमोल वचन
1) अपनी विद्वता पर गर्व करना सबसे बड़ा अज्ञान है। - स्वामी महावीर2) आलस्य दरिद्रता का मूल है। - यजुर्वेद
3) दुर्भाग्य को नहीं होती आँखें की वह मनुष्य का निरंतर पीछा करे। - डॉ॰ रामप्रसाद कुशवाहा
4) हमे ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता है।
5) मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है, बुद्धि का विकास होता है और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होकर स्वावलंबी बन सकता है। - स्वामी विवेकानंद
6) आत्मोन्न्ति के लिए कठिनाइयों से बढ़कर कोई विद्यालय नहीं है। -मुंशी प्रेमचन्द्र
7) दृढ़ प्रतिज्ञ मनुष्य संसार को अपनी इच्छा के अनुसार झुका लेता है। - गेटे
8) अपने साथ किए गए बुराइयों को बालू पर और अच्छाइयों को पत्थर पर लिखना चाहिए। - सुकरात
9) मूर्ख स्वयं को बुद्धिमान समझते है किन्तु वास्तविक में बुद्धिमान स्वयं को मूर्ख समझते हैं। - सेक्सपियर
10) जिस शिक्षा का असर हमारे चरित्र पर नहीं पड़ता वह किसी काम का नहीं। - महात्मा गाँधी
11) विनम्रता समस्त गुणों की आधारशिला है। - कनफ्यूसियस
12) मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। - नेपोलियन
13) अच्छे विचार रखना भीतरी सुन्दरता है। - स्वामी रामतीर्थ
14) गुणों का समूह हो तो एक दोष वैसे ही छुप जाता है जैसे चंद्रमा की किरणों में उसका कलंक । - कालिदास
15) जहाँ डींग समाप्त होती है प्रतिष्ठा वहीं से शुरू होती है। - शरतचंद्र
16) महान पुरुष अवसर की कमी की शिकायत कभी नहीं करते – इमर्सन
17) जो महान उद्देशय के लिए मरते हैं उनकी कभी हार नहीं होती – बायरन
18) निर्णय अनिर्णय के बीच झूलते व्यक्ति से बड़ा दरिद्र और कोई नहीं – विलियम जेम्स
19) अपनी अज्ञानता का आभास हो जाना ही ज्ञान का प्रथम सोपान है – डिजाराइली
20) असफलता से हमारी बुद्धि का जितना विकास होता है उतना सफलता से नहीं – स्माइल्स
21) दोष निकालना जितना आसान है उन्हे सुधारना उतना कठिन – प्लुटार्क
22) गुरुजनों को प्रणाम और बड़े बूढ़ों की सेवा करने वाले की आयु, विद्या, यश और बल ये चार चीजें बढ़ती है – मनुस्मृति
23) सत्य बोलने वाले को अपने मस्तिष्क पर यह बोझा नहीं ढोना पड़ता कि उसने कब किससे क्या कहा था – महात्मा गाँधी
24) उससे मित्रता कभी न कर जो तुझसे बेहतर नहीं – कन्फ़्यूसिअस
25) कुरूप मनुष्य का सौन्दर्य विद्या है, तपस्वियों का सौन्दर्य क्षमा है – चाणक्य
26) ऐसी बात मत कहो जिस पर खुद भी अमल ना कर सको – कुरान शरीफ
27) मेहनत का अन्त आराम है – अरस्तू
28) चित्त कि वृत्तियों को वश में रखना ही योग है – पतंजलि
29) मूर्खों से अपनी प्रसंशा सुनने के बजाय बुद्धिमानों कि लताड़ सुनना श्रेयकर है – बाइबिल
30) विचार कितने ही अच्छे क्यों न हों तदनुकूल आचरण नहीं है तो वे निरर्थक है – गीता
31) असफलता से निराश मत हो वह तो तुम्हारे लिए एक नई प्रेणना है – साउथ
32) अग्नि स्वर्ण को परखती है और मुसीबत वीर पुरुष को – लेवेटर
33) एकान्त प्राय: सर्वोत्म संगति है – मिल्टन
34) चरित्र की संपत्ति दुनिया के समस्त दौलतों से बढ़कर है – महात्मा गाँधी
35) अपनी भूल को स्वीकार कर लेना एवं वैसी भूल फिर न करने का प्रयास करना वीर एवं शूर होने का प्रतीक है – महात्मा गाँधी
36) अहिंसा वीरों का अस्त्र है और हिंसा कायरों का – महात्मा गाँधी
37) कायरता से हिंसा अच्छी है – महात्मा गाँधी
38) एक क्षण भी बिना काम के रहना एक प्रकार की चोरी है – महात्मा गाँधी
39) यदि मनुष्य सीखना चाहे तो उसकी हर भूल उसे शिक्षा दे सकती है – महात्मा गाँधी
40) कर्म ही जीवन की सफलता ककई कुंजी है – स्वामी विवेकानंद
41) हमारा उद्देश्य संसार के प्रति भलाई करना है, अपने गुणों करना नहीं – स्वामी विवेकानन्द
42) निराशा निर्बलता का चिन्ह है – स्वामी रामतीर्थ
43) लक्ष्य को ही अपना जीवन कार्य समझों, हर समय उसका चिन्तन करो, उसी का स्वप्न डेखो और उसी के सहारे जीवित रहो – स्वामी विवेकानंद
न्याय पाने की भाषायी आज़ादी
स्वतंत्रता पूर्व भारत मे
सरकारी समारोहों में ‘गाड सेव द किंग’ या ‘गाड सेव द क़्वीन’ गाया जाता था.
पर्ंतु 15 अगस्त 1947 से उसका स्थान ‘जन-गण-मन-अधिनायक जय हे’ ने लिया.
रातोंरात सभी सरकारी भवनो पर से ‘यूनियन जैक’ झंडा उतारकर तिरंगा झंडा लहरा
दिया गया. भारत में स्वतंत्रता का जश्न मनाया गया. भारत को यह स्वतंत्रता
लाखो स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों की कीमत पर मिली थी. पहली बार भारत
के लोगों ने आज़ादी का अर्थ समझा था. देश का संविधान बनाने की प्रक्रिया
आरम्भ हो चुकी थी और 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया. किसी
भी राष्ट्र के लिये राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और और राष्ट्रभाषा का बहुत
महत्व होता है. इसी महत्ता के चलते देश का राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान तय हो
गया परंतु बहुभाषी भारत मे राष्ट्रभाषा का चुनाव करने में बहुत समय लगा.
देश का यह दुर्भाग्य ही है कि आज भी अपने देश की कोई राष्ट्रभाषा नही है.
हिन्दी के प्रचलन के चलते हिन्दी को राजभाषा का दर्जा जरूर दे दिया गया था.
हिन्दी को राजभाषा का दर्जा
क्रांतिकारियों के संघर्षो
के कारण देश को स्वाधीनता मिली परंतु संविधान सभा का गठन स्वतंत्रता-पूर्व
जुलाई, 1946 में ही हो गया था. 11 दिसम्बर 1946 को डा. राजेन्द्र प्रसाद को
संविधान सभा का स्थायी सदस्य चुना गया. डा. कैलाश चन्द्र भाटिया ने एक लेख
में लिखा है कि संविधान सभा की नियम समिति ने डा. राजेन्द्र प्रसाद की
अध्यक्षता मे 1946 में ही एक निर्णय ले लिया था कि संविधान सभा का कामकाज
की हिन्दी या अंग्रेजी ही होगी और यदि कोई सदस्य अपनी मातृभाषा मे भाषण
देना चाहे तो अध्यक्ष की अनुमति से वह अपनी मातृभाषा मे भाषण दे सकता है.
फरवरी, 1948 में संविधान का जो प्रारूप प्रस्तुत किया गया उसमें राजभाषा के
संबंध को उल्लेख नही था. परंतु कन्हैया लाल मणिक लाल मुंशी के अथक
प्रयासों से 12,13,14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा मे राजभाषा के विषय पर
चर्चा हुई और 14 सितम्बर 1949 को संविधान निर्मताओं ने हिन्दी को राजभाषा
के रूप में अपनाया. इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार
देवनागरी लिपि मे लिखी गई हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप मे अंगीकार किया
गया. हलाँकि संविधान के अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार संविधान लागू होने से
15 वर्ष पश्चात तक अर्थात 25 जनवरी 1965 तक अंग्रेजी भाषा को संघ के सभी
कार्यों के लिये अंग्रेजी भाषा मे करने की व्यवस्था की गई. साथ यह व्यवस्था
भी की गई देश के महामहिम राष्ट्रपति यदि चाहें तो 15 वर्ष की अवधि पूर्व
भी यह आदेश दे सकते है कि अंग्रेजी के साथ हिन्दी का भी प्रयोग किया जा
सकता है.
हिन्दी और राष्ट्रपति के आदेश
राष्ट्रपति का पहला आदेश 27
मई 1952 को विधि-मंत्रालय की अधिसूचना के रूप में और भारत के राजपत्र में
प्रकाशित हुआ. इस आदेश के अनुसार राज्यपालों, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के
न्यायाधीशों की नियुक्ति अधिपत्रों को प्राधिकृत कर दिया गया. राष्ट्रपति
का दूसरा आदेश 3 दिसम्बर 1955 को गृह मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया गया
जिसे संविधान (राजकीय प्रयोजनो के लिये हिन्दी भाषा) आदेश 1955’ के रूप में
जाना जाता है. इस आदेश के अनुसार जनता से पत्र-व्यवहार, संसद और प्रशासनिक
रिपोर्टें, राजकीय पत्रिकाएँ, सरकारी संकल्प, राजभाषा को अपनाने वाले
राज्यों से पत्र-व्यवहार, संधिय़ाँ व करार जैसे प्रमुख क्रियाकलापों में
हिन्दी को अपनाने के लिये कहा गया. इसी आदेश के परिणामस्वरूप विभिन्न
मंत्रालयों में हिन्दी-अनुवादकों की नियुक्तियाँ शुरू हुई. उसके बाद
राष्ट्रपति द्वारा कई आदेश जारी किये गये और 1963 में राजभाषा अधिनियम बना.
हिन्दी-प्रयोग में आशंकाएँ
हिन्दी-प्रयोग ने लोगों को
कई आशंकाओं में डाल दिया. सैन्य-सेवा मे हिन्दी-प्रयोग से लोग सबसे ज्यादा
आशंकित थे. उनका मानना था कि सेना के जवानो आदेश या उनके साथ वार्तालाप
अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कर कैसे उपयोग किया जाय. भाषा के कारण सैनिकों
के मनोबलों और देश-सुरक्षा के साथ खिलवाड नही किया जा सकता. इसी प्रकार से
हिन्दी-प्रयोग को लेकर लोगों के मन में बहुत सी आशंकाएँ रही, जिसका कारण
लोग मुख्यतया दैनिक कार्यों के निमित्त हिन्दी मे शब्दों की कमी मानते थे.
कुछ कमोबेश यही हालत विधि क्षेत्र की भी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के
प्रारम्भिक वर्षों में न्यायालयों का अधिकतर कार्य फारसी भाषा में होता था.
आज भी हम न्यायालयों के आदेशों मे हम फारसी भाषा का प्रभाव देख सकते हैं.
1836 तक आते-आते फारसी का उपयोग खत्म हो गया और उसका स्थान हिन्दी,अंग्रेजी
और उर्दू ने ले लिया. 1950 में देशी रियासतों के भारत में विलय होने तक
न्यायालयों का कामकाज़ प्रादेशिक भाषा मे ही होता था. ग्वालियर, पटियाला,
बडौदा, जम्मू-कश्मीर हैदराबाद की रियासतें इसका प्रमुख उदाहरण हैं. इतना ही
नही भारत की विशालता के चलते ही यहाँ पर कई भाषाई-राज्यों का भी गठन किया
गया. और राज्यो को यह अधिकार दिया गया कि वे खुद तय करें कि उनकी राज्यभाषा
क्या होगी. सारी परिस्थितियों पर चर्चा के उपरांत यह तय किया गया कि सभी
राज्य एक दूसरे राज्य व केन्द्र के साथ राजभाषा में ही पत्र-व्यवहार करें.
परंतु यह देश की विडम्बना ही है कि सरकारी स्तर पर प्रयास करने के बावज़ूद
आज भी राजभाषा सुचारू रूप से देश-स्तर पर संतोषजनक रूप से लागू नही है. आज
भी अशिक्षित लोगों को न्यायालय मे न्याय उनकी मातृभाषा में नही मिलता है.
पिछले दिनों कैट (केन्द्रीय
प्रशासनिक प्राधिकरण) से लेकर उच्च न्यायालय तक के दिये हुए फैसलों को
पलटते हुए देश की सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दी मे आरोपपत्र पाने के अधिकार
पर ऐसा ऐतिहासिक फैसला दिया जिसने देश के हिन्दी-प्रेमियों की दम तोडती आस
पर संजीवनी-बूटी सा असर किया. जिसने आम-जन को अपनी मातृभाषा मे न्याय पाने
अधिकार की माँग करने वालों लोगों में एक आस की अलख को जगाया. दरअसल यह
मामला मुम्बई के एक नौसेना कर्मी मिथलेश का था, जिसे उच्चाधिकारियों के साथ
दुर्व्यवहार व उनका आदेश न मानने पर एक आरोपपत्र दिया गया था. नौसेना
कर्मी ने हिन्दी भाषा मे आरोपपत्र की मांग की जिसे विभाग ने खारिज कर दिया.
जिससे नौसेना कर्मी ने विभागीय जाँच मे भाग नही लिया. परिणामत: विभाग ने
नौसेना कर्मचारी पर कार्यवाही कर सजा के रूप मे उसके वेतनमान मे कटौती कर
दी. जिसे नौसेना कर्मचारी ने आरोपपत्र हिन्दी में न मिलने के कारण को आधार
बनाते हुए विभागीय जाँच को रद्द करने की माँग की. स्वतंत्रता-प्राप्ति के
पश्चात आज भी सर्वोच्च न्यायालय और अधिकांश उच्च न्यायालयों मे अपनी
मातृभाषा मे आरोपी अपना पक्ष नही रख सकता. परिणामत: आरोपी को यह पता ही नही
चल पाता कि उसके वकील माननीय न्यायाधीशों के समक्ष क्या तर्क कर रहें है.
इसलिये आरोपी अपने आप को ठगा-सा महसूस करते है.
कहने को तो हिन्दी देश की
राजभाषा है, परंतु आज भी प्रशासनिक व न्यायालय के कामकाज़ में अंग्रेजी का
ही वर्चस्व है. देश की शीर्ष अदालत के फैसले के निहितार्थ यही है कि ऐसे
मामलों में न्याय के लिये उसी भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए जिस भाषा को
आरोपी समझता हो, ताकि कोई भी व्यक्ति तथ्यों को ठीक-ठाक समझकर अपना पक्ष रख
सके. अब समय आ गया है कि अब राजभाषा अधिनियम की नये सिरे से समीक्षा की
जाये क्योंकि किसी भी स्वतंत्र देश में मातृभाषा में अपना पक्ष रखना और
जवाब मांगना किसी भी व्यक्ति का हक होता है.
शुभ कामनाओं सहित-
अनिल कुमार शुक्ला,दिबियापुर-औरैया,

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