गणतन्त्र दिवस परेड में निकलने वाली झॉकियों में आकर्षण का केन्द्र होगी राजस्थान की ‘कावड़ कला’ की झाँकी
झांकी के मुख्य भाग ट्रेक्टर पर राजस्थानी परिधान में सजी युवती को ‘तेरहताली-नृत्य’ प्रस्तुत करते हुए दर्शाया है। जो 8 फुट ऊँची फाइबर से बनी मूर्ति होंगी साथ ही आगे एवं साइड में रंगीन छोटी कावड़े दिखाई गई है।
झांकी के मध्य भाग में (ट्रेलर) में 8 महिलाएं एवं 2 पुरूष तेरहताली का सजीव प्रदर्शन करते दिखाई देंगे। झांकी के पिछले हिस्से में 9 फीट ऊँची कावड़ घूमते हुए दिखाई गई है। खिड़कीनुमा कावड़ के विभिन्न पाटों में लोक देवताओं पर आधारित कथाऐं चित्रित होंगी। इसी प्रकार झांकी के दोनों ओर भी चित्रित कावड़ एवं कावड़ पर काम करते हुए कलाकारों की मूर्तियां फाइबर ग्लास में बनी दिखाई जायेगी।
भारत के सभी प्रान्त इसमें अपनी डिजाइन एवं मॉडल रक्षा मंत्रालय में प्रस्तुत करते हैं। रक्षा मंत्रालय ने कुल तेंरह राज्यों की झांकी के मॉडल को ही स्वीकृति प्रदान की है, जिसमें राजस्थान एक है। उल्लेखनीय है कि राजस्थान की झांकी का विगत तीन वर्षों से चयनित होता आ रहा है। गत वर्ष राजस्थान की ‘बूंदी चित्रशाला‘ को द्वितीय पुरस्कार मिला था।
इसी क्रम में इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड के लिए जयपुर के नामी कलाकार हरशिव शर्मा द्वारा निर्मित झांकी का चयन हुआ है। इस बार शर्मा ने उदयपुर की ‘कावड़‘ को अपना विषय बनाया है। पूर्व के वर्षों में लगातार हरशिव शर्मा द्वारा तैयार झांकियां दिल्ली के जनपथ पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने में कामयाब होती रही हैं। पिछले साल इनकी ‘‘बूंदी के महल और चित्रशाला’’ की झांकी को गणतंत्र दिवस परेड़ में द्वितीय पुरस्कार का सम्मान मिला था।
क्या होती है ‘कावड़‘
आम, अडूसा और सागवान की लकड़ी से बनी एक अलमारी नुमा आकृति को कावड़ कहा जाता है। दो हजार वर्ष से भी अधिक पुरानी इस अनूठी कावड़ कला का उद्भव उज्जैन के विक्रमादित्य काल में होना बताया जाता है। कालान्तर में यह कला दक्षिण राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में लकड़ी का काम करने वाले कलाकारों ने अपना ली।
कावड़ की विशेषता यह है कि इस अलमारी के कपाट परत दर परत खुलते जाते हैं और हर कपाट के खुलने के साथ ही उन पर अंकित चित्र कथाएं भी खुलती जाती है। कावड पढ़ने वाले इन्हीं चित्रों के आधार पर सम्पूर्ण कथा सुनाते जाते है। लकड़ी की कावड़ में ऐतिहासिक घटनाओं के एक-एक प्रसंग देखने वालों के सामने इस तरह से आते है जैसे वह किसी रंगमंच पर कोई नाटक देख रहे हो। जिसमें रामायण एवं महाभारत की पौराणिक कथाओं को चित्रों के माध्यम से एक साथ देखा जा सकता है। आम तौर पर एक बड़ी कावड़ आठ फीट ऊंची और बीस फुट चौड़ी हो सकती है। 4 से 16 कपाट तक खुलने वाली कावड़ बनी है। सबसे छोटी कावड़ माचिस की डिब्बी के आकार की हो सकती है। जिसमें बारीक चित्रों से उत्कृष्ट कला उकेरी हुई देख कर कला के पारखी दर्शक उसे देख चकित हुए बिना नहीं रह सकते।
रामायण, महाभारत और बाईबल के अलावा भगवान गणेश, महावीर जी, प्रभु यीशु, स्वामी विवेकानन्द, आदि शंकराचार्य, मुगल-दरबार, दुर्गादास राठौड, आचार्य महायज्ञ, दशामाता के साथ ही पंचतंत्र, पंचकुला, सहित अनेक लोक प्रचलित दंत कथाओं पर कावडें बनाई जाती है। अब तो दहेज प्रथा, पोलियों, साक्षरता आदि कार्यक्रमों पर भी कावड़ बनती है।
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